Home विद्यालय शिक्षा उत्तर क्षेत्रीय बालिका शिक्षा बैठक, कुरूक्षेत्र : मुख्य बिंदु

उत्तर क्षेत्रीय बालिका शिक्षा बैठक, कुरूक्षेत्र : मुख्य बिंदु

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प्रथम सत्र – बैठक का स्वरूप, उद्देश्य : श्रीमती कुसुम कौशल

शारीरिक, प्राणिक, मानसिक तथा बौद्धिक दृष्टि से परिपक्व बालिकाओं का विकास करना। नारी विशेष गुणों की धनी होती है। उसमें सृजन करने की क्षमता तथा पृथ्वी के समान धारण करने का सामर्थ्य होता है। नारी व पुरुष दोनों एक ही बीज के दो अंश हैं। इस विश्व को प्रगति की ओर ले जाने का दायित्व दोनों का समान ही है। संस्कार युक्त बालिका के विकास में परिवार का महत्वपूर्ण योगदान होता है। अतः परिवार प्रबोधन बालिका शिक्षा का एक मुख्य आयाम है। किशोरावस्था से जुड़ी समस्याओं का समाधान, नारी होने के गौरव का भान कराना, मातृत्व बोध, व्रतों, उत्सवों का वैज्ञानिक आधार बताना, संयुक्त परिवार की परंपरा का निर्वहन, बालिकाओं को उनके नैसर्गिक गुणों की पहचान कराना बालिका शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य है। विद्यालय इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु महत्त्वपूर्ण माध्यम है।

द्वितीय सत्र – वर्तमान परिदृश्य में बालिका शिक्षाः सुश्री रेखा चूड़ासमा

बालिका शिक्षा विद्या भारती का केन्द्रीय विषय है। इस विषय पर लगभग 35 वर्ष पूर्व चिंतन हुआ था। चिंतन का उद्देश्य था – बालिकाओं द्वारा गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा अर्जित करना व आत्मनिर्भर होना। यद्यपि आज की बालिका सभी क्षेत्रों में अग्रणी है लेकिन कैरियर की अंधी दौड़ में अपने नैसर्गिक गुणों से विमुख एवं महत्त्वाकांक्षी होती जा रही है । बालिका में ऐसे गुणों का विकास करने की आवश्यकता है जिससे वह अपने कैरियर और परिवार दोनों में समन्वय स्थापित कर सके।

तृतीय सत्र – दृश्य-श्रव्य( बालिका शिक्षा पाठ्यक्रम एवं गतिविधियां) : सुश्री रेखा चूड़ासमा

बालिका शिक्षा को विद्यालयों में लागू करने हेतु निर्धारित किए गए पाठ्यक्रम एवं गतिविधियों को पी.पी.टी. के माध्यम से दर्शाया गया। बालिका शिक्षा विषय को अतिरिक्त विषय के रूप में न लेकर पढ़ाए जाने वाले अन्य विषयों के साथ समेकित (Integrate) किया जाए। प्रेरक वीडियो क्लिप के माध्यम से बालिकाओं में मातृत्व भाव, वात्सल्य भाव एवं नैतिक मूल्यों को जागृत करना। विषय परिस्थितियों में स्वयं को सुरक्षित रखने हेतु बालिका द्वारा स्व-सुरक्षा के गुर सीखना।

चतुर्थ सत्र – राष्ट्रीय शिक्षा नीति एवं बालिका शिक्षाः श्री देशराज शर्मा

राष्ट्रीय शिक्षा यह नीति समाज में महिलाओं की विशिष्ट और महत्वपूर्ण भूमिका, वर्तमान व भावी पीढ़ियों के आचार-विचार को आकार देने में उनके योगदान को ध्यान में रखते हुए मानती है कि एसईडीजी की लड़कियों के लिए गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की व्यवस्था उनकी वर्तमान व आने वाली पीढियों के शैक्षिक स्तर को ऊपर उठाने का सर्वोत्तम तरीका होगा. यह नीति इस बात की सिफारिश करती है कि एसईडीजी विद्यार्थियों के उत्थान के लिए बनाई जा रही नीतियों और योजनाओं को इन समूहों की बालिकाओं पर केन्द्रित होना चाहिए। भारत सरकार सभी लड़कियों और साथ ही ट्रांसजेंडर छात्रों को गुणवत्तापूर्ण और न्यायसंगत शिक्षा प्रदान करने की दिशा में देश की क्षमता का विकास करने हेतु एक ‘जेंडर समावेशी निधि’’का गठन करेगी ऐसे स्थान जहां विद्यालय तक आने के लिए छात्राओं को अधिक दूरी तय करनी पड़ती है वहां नवोदय विद्यालय के स्तर की तर्ज पर नि:शुल्क छात्रावासों का निर्माण किया जाएगा, विशेषकर सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित पृष्ठभूमि से आने वाली बालिकाओं के लिए। इनमें लड़कियों की सुरक्षा की उपयुक्त व्यवस्था की जाएगी। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों को और अधिक मजबूत बनाया जाएगा तथा सामाजिक –आर्थिक रूप से पिछड़े समूहों की बालिकाओं की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा वाले विद्यालयों (ग्रेड12 तक) में प्रतिभागिता बढ़ाने की दृष्टि से इन्हें और अधिक विस्तारित किया जाएगा।

पंचम सत्र- किशोरावस्था संभाल भावी सुखमय जीवन का आधारः श्री अवनीश भटनागर

बालिका के प्रति परिवार की सोच में काफी बदलाव आया है। बालिकाओं की शिक्षा व कैरियर के प्रति सजगता में वृद्धि होती जा रही है, लेकिन परिवार के प्रति दायित्वों में कमी आती जा रही है। समाज में होने वाले परिवर्तनों के कारण बालिका का रहन-सहन, खान-पान बदलता जा रहा है। वह स्वयं को’बहन जी ‘ जैसे विशेषणों से दूर रखना चाहती है। परिवर्तन की तेज आंधी में बालिकाओं को डटकर खड़े रहना सिखाना बालिका शिक्षा के माध्यम से सफलता पूर्वक किया जा सकता है। बालिकाओं में जागृति लाने हेतु विशेष क्षेत्रों में विशिष्ट उपलब्धियां प्राप्त कर चुकी महिलाओं के संघर्ष की कहानियां सुनानी चाहिए। जीवन विकास की यात्रा को यदि एक वृक्ष मान लें तो वृक्ष की जड़ जीवन के अनुभवों को,तना संस्कार व चरित्र निर्माण, फूल पत्तियां अच्छे बुरे के अनुभव एवं व्यक्तित्व विकास को परिलक्षित करते हैं। हमें किशोर बालक व बालिकाओं के समक्ष तर्क तथा वैज्ञानिक आधार प्रस्तुत करने होंगे तभी वे हमसे सहमत होंगे। सक्षम एवं संस्कारवान बालिका ही अपने परिवार को एकता के सूत्र में बांध कर रख सकती है।

षष्ठम सत्र- संगठनात्मक स्वरूप, बालिका शिक्षा की योजना व क्रियान्वयनः श्री सुरेन्द्र अत्री

किसी भी कार्य के सफल क्रियान्वयन हेतु संगठनात्मक स्वरूप, योजना बनाना तथा योजना को क्रियान्वित करना अत्यंत आवश्यक व महत्वपूर्ण है। संगठनात्मक संरचना के आधार पर आदेश एवं निर्णय ऊपर से नीचे की तरफ अर्थात विद्यालय स्तर तक जाते हैं तथा सुझाव एवं संशोधन विद्यालय स्तर से अखिल भारतीय स्तर तक पहुंचते हैं। कार्य को विस्तार देने हेतु प्रवास भी अत्यंत अनिवार्य है। प्रवास पर जाने से पूर्व हमारी पूरी तैयारी होनी चाहिए। विषय का गहन अध्ययन करना चाहिए। अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए कुछ प्रेरक, तार्किक व व्यावहारिक प्रसंगों का प्रयोग करना चाहिए।

सप्तम सत्र- नए प्रयोगः सुश्री रेखा चूड़ासमा

बालिका शिक्षा के क्षेत्र में किए जाने वाले कुछ पूर्व प्रयोगों जैसे सरस्वती यात्रा(अनुभव आधारित शिक्षा), माता-पुत्री सम्मेलन, बालिका कक्षा-कक्ष की व्यवस्था व परामर्श केंद्र की विद्यालयों में बहुत उपयोगिता है। बालिका शिक्षा विषय को बालिकाओं और अभिभावकों तक पहुंचाने के लिए नित नए-नए प्रयोग करते रहना चाहिए।

अष्टम सत्र- कन्या भारती, बालिका परिषद गठन – सुश्री रेखा चूड़ासमा

29,30 सितंबर 2022 को जयपुर में आयोजित अखिल भारतीय चिंतन बैठक में सर्वसम्मति से तय किया गया कि विद्यालय की सभी बालिकाओं को उनकी रूचि के अनुसार निम्नलिखित 09 परिषदों में विभाजित करके कार्य को गति दी जाए:-

1.आहार एवं स्वास्थ्य परिषद

2. जीवनचर्या परिषद

3. स्व-सुरक्षा परिषद

4. ललित कला व उत्सव परिषद

5. कौशल विकास एवं आत्मनिर्भर परिषद

6.भारतीय परिवार एवं प्रबोधन

7.जीवनशैली मे विज्ञान परिषद

8. भारतीय दर्शन एवं संस्कृति संवर्द्धन परिषद

9. समाज, संस्कृति एवं राष्ट्र बोध परिषद

नवम सत्र- क्रिया शोध Action Research – डा. जितेंद्र जांगला

अध्यापन एक सतत प्रक्रिया है और परिवर्तन समाज का नियम है। समय कदाचित नहीं रुकता आने वाले बदलाव भी नहीं रुकते तकनीकी भी नए कलेवर में हमारे समक्ष आती रहती है ।अतः प्रत्येक शिक्षक को नई तकनीकी को सीखने का प्रयत्न करना चाहिए जिससे कि उसकी अध्यापन कला निखरती चली जाए। विज्ञान एवं तकनीक दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। जिस प्रकार बिना आत्मा के शरीर संभव नहीं उसी प्रकार विज्ञान भी बिना तकनीकी के अधूरा है, शिक्षा को हमें दैनिक जीवन से जोड़ना होगा। आने वाली समस्या का समाधान तभी संभव है जब हम उस समस्या की जड़ को ढ़ूंढ़े। पढ़ाते समय हमें अपना उद्देश्य स्पष्ट रहना चाहिए। विद्यार्थियों को विषय को आत्मसात करवाना होगा जिससे कि उनकी सृजनात्मकता का विकास हो।शिक्षक स्वयं को तभी सफल समझें जब कक्षा का प्रत्येक विद्यार्थी उसके विषय को समझे तथा दैनिक क्रियाओं से विषय के सिद्धांतों को जोड़ सकें।अध्यापन के समय शिक्षक की दृष्टि में कक्षा का प्रत्येक छात्र रहना चाहिए तभी बालक की एकाग्रता विषय में रहेगी। शिक्षक को समय-समय पर स्व – मूल्यांकन करते रहना चाहिए। इसका सबसे अच्छा तरीका Action Research है।

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